Shikara movies 2020

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Artists: Adil Khan, Saadia, Priyanshu Chatterjee

Director: Vidhu Vinod Chopra

Author: Rahul Pandita, Abhijat Joshi, Vidhu Vinod Chopra


Thousands of Kashmiri Pandits had to leave their homes as terrorists on January 19, 1990, nearly 30 years ago. They hoped that they would soon be able to live in their homes again in the same way as they had lived for decades. He hoped that there would be noise in Parliament for him, but there was no voice in his favor. 30 years have passed since then, even today they remain refugees in their own country.
Many Kashmiri Pandits have also departed from the world pressed into their chest hoping to stay in their home again.

Producer-director Vidhu Vinod Chopra's film 'Shikara' is a film woven around this story. However he has put the cultivation of terror in the valley and the resulting atrocities on Kashmiri Pandits as a mere reference in the film and presents it more as a love story of a Kashmiri Pandit couple. The story begins in 1987, when the Kashmir Valley was as much to the Kashmiri Pandits as it was to the Kashmiri Muslims. When the two communities were united with the whole harmony. The film ends in 2018, when thousands of Kashmiri Pandits are still cursed to live a refugee's life.

A film is being shot in Kashmir. The director should add a Kashmiri as extras. Her assistants are Shiva Prakash Dhar (Adil Khan) and Shanti Sapru (Sadia). Shiva writes poems, is a peace nurse. After this incident, the two fall in love and they get married. He spends his first night in a shikara in Dal Lake, which is why Shanti keeps his new home named Shikara. She makes Rogan zeal for Shiva and Shiva writes poems for her - "Being with you feels like a full house." But their happiness does not last long. In a year or two, circumstances change such that homes of Kashmiri Pandits start burning, their murders start and they have to leave Kashmir and flee and spend their lives in a refugee camp in Jammu…

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The film is primarily a love story of Shiva and Shanti. Director Vidhu Vinod Chopra has used the terrorism and tragedy of Kashmiri Pandits in the valley as a mere reference. A little glimpse of him is seen. That too in the film's predecessor. After intermission, the film focuses entirely on the love story of Shiva and Shanti. Vidhu says more in his words. Writer Rahul Pandita, Abhijat Joshi and Vidhu do not discuss much about the causes of terrorism in the Valley. Doesn't raise much questions, just focus on love. That is why in the film the scene of the burning of Kashmiri Pandits in the house, the directors show their shadows instead of showing the faces of miscreants. They simply try to explain that government repression and US terrorism are the main reasons behind terrorism in Kashmir. That is why the film's protagonist writes letters to the President of America, not to the rulers of India.

But the love story of this film is very strong. She soaks to the inside. It instills confidence in the power of love. The love of Shiva and peace does not diminish even in the toughest moments of life. It is love that saves their lives from being bitter and also prevents them from becoming bitter towards their victims. The cinematography of Rangarajan Rambhadran is superb. With his camera, he captures the natural beauty of Kashmir, the life of the people and the mood of the film in the best way. Editing of Vidhu is also good. The song and music of the film is normal.

Adil Khan's performance as Shiva is very good. In the very first film, he has done a great job. He has effectively evoked the suffering of an exiled Kashmiri Pandit from his acting. Saadia also influences the form of peace. This is also her first film and the first film she has been able to impress. Priyanshu Chatterjee's role as Shiva's maternal brother Naveen is small, but he remains remembered. The artist who played the role of Latif also has a good performance. The rest of the actors playing small roles have also done their job well.

If you see this film as a love story, then it will impress you, make you emotional, will make you compassionate. But if you relate this to the expulsion of Kashmiri Pandits, their tragedy, then you may be disappointed, because their suffering does not get a clear expression. It is a great film based on cinematic parameters and makes an impact.


HINDI


कलाकार: आदिल खान, सादिया, प्रियांशु चटर्जी

निर्देशक: विधु विनोद चोपड़ा

लेखक: राहुल पंडिता, अभिजात जोशी, विधु विनोद चोपड़ा



आज से करीब 30 साल पहले, 19 जनवरी 1990 को हजारों कश्मीरी पंडितों को आतंक का शिकार होकर अपना घर छोड़ना पड़ा था। उन्हें उम्मीद थी कि वे जल्दी ही अपने घरों में दुबारा से उसी तरह रह पाएंगे, जैसे दशकों से रहते आए थे। उन्हें उम्मीद थी कि उनके लिए संसद में शोर मचेगा, लेकिन उनके पक्ष में कहीं से कोई आवाज नहीं उठी। तब से लेकर अब तक 30 साल बीत गए, आज भी वे अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं।
कई कश्मीरी पंडित अपने घर में फिर से रहने की आस अपने सीने में दबाए दुनिया से विदा भी हो गए।

निर्माता-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘शिकारा’ इसी कथ्य के आसपास रख कर बुनी गई फिल्म है। हालांकि उन्होंने घाटी में आतंक की खेती और उसके परिणामस्वरूप कश्मीरी पंडितों पर हुए वीभत्स अत्याचारों को फिल्म में बस संदर्भ के रूप में रखा है और इसे एक कश्मीरी पंडित जोड़े की प्रेम कहानी के रूप में ज्यादा प्रस्तुत किया है। कहानी शुरू होती है 1987 में, जब कश्मीर घाटी कश्मीरी पंडितों की भी उतनी ही थी, जितनी कश्मीरी मुसलमानों की। जब दोनों समुदाय पूरे सौहाद्र्र के साथ मिल-जुल कर रहते थे। फिल्म खत्म होती है 2018 में, जब हजारों कश्मीरी पंडित अभी भी शरणार्थी का जीवन जीने को अभिशप्त हैं।

कश्मीर में एक फिल्म की शूटिंग हो रही है। निर्देशक को एक्स्ट्रा कलाकारों के रूप में एक कश्मीरी जोड़ा चाहिए। उसके असिस्टेंट शिव प्रकाश धर (आदिल खान) और शांति सप्रू (सादिया) को चुनते हैं। शिव कविताएं लिखता है, शांति नर्स है। इस घटना के बाद दोनों में प्यार हो जाता है और वे शादी कर लेते हैं। वह अपनी पहली रात डल झील में एक शिकारा में बिताते हैं, इसीलिए शांति अपने नए घर का नाम शिकारा रखती है। वह शिव के लिए रोगन जोश बनाती है और शिव उसके लिए कविताएं लिखता है- ‘तेरे होने से घर भरा-भरा सा लगे।’ लेकिन उनका ये सुख ज्यादा दिन नहीं टिकता। एक-दो सालों में परिस्थितियां ऐसी बदलती हैं कि कश्मीरी पंडितों के घर जलने शुरू हो जाते हैं, उनकी हत्याएं होने लगती हैं और उन्हें कश्मीर छोड़ कर भागना पड़ता है और जम्मू में एक शरणार्थी कैम्प में अपना जीवन गुजारना पड़ता है...

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यह फिल्म मुख्य रूप से शिव और शांति की प्रेम कहानी है। निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने घाटी में आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों की त्रासदी को सिर्फ संदर्भ के रूप में प्रयोग किया है। उसकी थोड़ी-सी झलक दिखलाई है। वह भी फिल्म के पूर्वाद्र्ध में ही। मध्यांतर के बाद फिल्म पूरी तरह शिव और शांति की प्रेम कहानी पर फोकस करती है। विधु अपनी बात प्रतीकों में ज्यादा कहते हैं। लेखक राहुल पंडिता, अभिजात जोशी और विधु घाटी में आतंकवाद के कारणों की ज्यादा चर्चा नहीं करते। ज्यादा सवाल नहीं उठाते, बस प्रेम पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसीलिए फिल्म में कश्मीरी पंडितों के घर जलने के जो दृश्य है, उसमें निर्देशक उपद्रवियों के चेहरे दिखाने की बजाय उनकी परछाइयों को दिखलाते हैं। वे बस यह समझाने की कोशिश करते हैं कि सरकारी दमन और अमेरिका कश्मीर में आतंकवाद के पीछे मुख्य वजह हैं। इसीलिए फिल्म का नायक अमेरिका के राष्ट्रपति को चिट्ठियां लिखता है, भारत के हुक्मरानों को नहीं।

लेकिन इस फिल्म की प्रेम कहानी बहुत सशक्त है। वह अंदर तक भिगोती है। प्रेम की शक्ति में भरोसा पैदा करती है। शिव और शांति का प्रेम जिंदगी के सबसे कठिन लम्हों में भी कम नहीं होता। वह प्रेम ही है, जो उनके जीवन को कड़वा होने से बचाता है और अपने पीड़कों के प्रति भी कड़वा होने से बचाता है। रंगराजन रामभद्रन की सिनेमेटोग्राफी शानदार है। वह अपने कैमरे से कश्मीर की नैसर्गिक खूबसूरती, वहां के जनजीवन और फिल्म के मूड को बेहतरीन तरीके से पेश करते हैं। विधु की एडिटिंग भी अच्छी है। फिल्म का गीत-संगीत सामान्य है।

शिव के रूप में आदिल खान का अभिनय बहुत अच्छा है। पहली ही फिल्म में उन्होंने शानदार काम किया है। एक निर्वासित कश्मीरी पंडित की पीड़ा को उन्होंने प्रभावी तरीके से अपने अभिनय से उभारा है। शांति के रूप सादिया भी प्रभावित करती हैं। उनकी भी यह पहली फिल्म है और पहली फिल्म में ही वह प्रभावित करने में सफल रही हैं। शिव के ममेरे भाई नवीन के रूप में प्रियांशु चटर्जी की भूमिका छोटी है, लेकिन वह याद रह जाते हैं। लतीफ की भूमिका जिस कलाकार ने निभाई है, उसका अभिनय भी अच्छा है। बाकी छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाने वाले कलाकारों ने भी अपना काम ठीक किया है।

अगर इस फिल्म को आप एक प्रेम कहानी के रूप में देखेंगे, तो आपको प्रभावित करेगी, भावुक करेगी, आपमें करुणा भरेगी। लेकिन आप इसे कश्मीरी पंडितों के निष्कासन, उनकी त्रासदी से जोड़ कर देखेंगे, तो आप शययद निराश हो सकते हैं, क्योंकि इसमें उनकी पीड़ा को मुखर अभिव्यक्ति नहीं मिलती है। सिनेमाई मापदंडों के आधार पर यह एक श्रेष्ठ फिल्म है और असर छोड़ती है।

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